Wednesday, 26 April 2017

निस्सीम

मैंने फिर लिखा
फिर मिटाया
न जाने कितनी बार
ऐसा नहीं है माँ !
कि मुझे लिखना नहीं आता
तुम हो कि
शब्दों में
समाती ही नहीं